Monday, 17 July 2017

Story in Hindi - ईश्वर हमें हमेशा दो रास्ते देता है

एक समय की बात है। गरीबी से परेशान एक युवक अपना जीवन समाप्त करने के लिए नदी पर गया, वहां युवक को एक साधु मिल गए उन्होंने उसे ऐसा करने के लिए मना कर दिया। साधु ने युवक की परेशानी का कारण पूछा। युवक ने सारी बात साधु को बता दी। सब कुछ सुनकर साधु ने कहा- मेरे पास एक विद्या है जिससे जादुई घड़ा बन जाता है। तुम जो भी इस घड़े से मांगोगे, वह तुम्हारे लिए उपस्थित हो जाएगा। परंतु जिस दिन घड़ा फूट गया, उसी समय जो कुछ भी इस घड़े ने दिया था, वह सब अदृश्य हो जाएगा।

साधु ने आगे कहा अगर तुम दो वर्ष तक मेरे आश्रम में रहो, तो यह घड़ा मैं तुम्हें दे सकता हूं। और अगर पांच वर्ष तक आश्रम में रहो, तो मैं यह घड़ा बनाने की विद्या तुम्हें सिखा दूंगा। तुम क्या चाहते हो?


युवक ने कहा- महाराज! मैं तो दो साल ही आपकी सेवा करना चाहूंगा। मुझे तो जल्द से जल्द यह घड़ा ही चाहिए। मैं इसे बहुत संभालकर रखूंगा। कभी फूटने ही नहीं दूंगा। इस तरह दो वर्ष आश्रम में सेवा करने के बाद युवक ने यह जादुई घड़ा प्राप्त कर लिया और उसे लेकर अपने घर आ गया।

उसने घड़े से हर इच्छा पूरी करनी चाही और वह पूरी होती गई। घर बनवाया, महल बनवाया, नौकर-चाकर मांगे। वह सभी को अपनी धाक व वैभव-संपदा दिखाने लगा। उसने शराब पीना शुरू कर दिया। एक दिन वह जादुई घड़ा सर पर रखकर नाचने लगा। अचानक उसे ठोकर लगी और घड़ा गिरकर फूट गया। घड़ा फूटते ही सभी कुछ छू-मंतर हो गया। अब युवक पश्चाताप करने लगा कि काश! मैंने जल्दबाजी न की होती और घड़ा बनाने की विद्या सीख ली होती तो आज मैं फिर से कंगाल न होता।

सीख - ईश्वर हमें हमेशा दो रास्ते देता है- एक आसान और दूसरा कठिन और लंबा लेकिन गहरे ज्ञान वाला। यह हमें चुनना होता है कि हम किस रास्ते पर चलें।

Inspiring Story in Hindi - क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है।

बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ की निर्णायक थीं मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाक़ी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिये बाहर जाना पड़ गया।

लेकिन जाने से पहले देवी भारती नें दोनों ही विद्वानों के गले में एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, यें दोनो मालाएं मेरी अनुपस्थिति में आपके हार और जीत का फैसला करेंगी। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गई। शास्त्रार्थ की प्रकिया आगे चलती रही।




कुछ देर बाद देवी भारती अपना कार्य पूरा करके लौट आई। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी- बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी।

सभी लोग ये देखकर हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान नें देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की- हे ! देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थीं फिर वापस लौटते ही आपनें ऐसा फैसला कैसे दे दिया ?

देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ में पराजित होने लगता है, और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रोधित हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे हैं। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।

विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गये, सबने उनकी काफी प्रशंसा की।

#सीख - क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तों में दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी क्रोध को खुद पर हावी ना होने दें क्योंकि कोध्र से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है, जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है, जब तर्क नष्ट होता है, तब व्यक्ति का पतन हो जाता है।

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अपने अहंकार के घमंड में दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करो, जो तुम्हें स्वयं के लिए पसंद न हो। [ Hindi Story ]

एक बार मगध के व्यापारी को व्यापार में बहुत लाभ हुआ, अपार धन-संपत्ति पाकर उसका मन अहंकार से भर गया। उसके बाद से वह अपने अधीनस्थों से अहंकारपूर्ण व्यवहार करने लगा।

व्यापारी का अहंकार इतना प्रबल था कि उसको देखते हुए उसके परिवार वाले भी अहंकार के वशीभूत हो गए। किंतु जब सभी के अहंकार आपस में टकराने लगे तो घर का वातावरण नरक की तरह हो गया।

वह व्यापारी दुःखी होकर एक दिन भगवान बुद्ध के पास पहुंचा और याचना करके बोला- भगवन्! मुझे इस नरक से मुक्ति दिलाइए। मैं भी भिक्षु बनना चाहता हूं।

भगवान बुद्ध ने गंभीर स्वर में कहा- अभी तुम्हारे भिक्षु बनने का समय नहीं आया है।


बुद्ध ने कहा- भिक्षु को पलायनवादी नहीं होना चाहिए। जैसे व्यवहार की अपेक्षा तुम दूसरों से करते हो, स्वयं भी दूसरों के प्रति वैसा ही व्यवहार करो। ऐसा करने से तुम्हारा घर मंदिर बन जाएगा।

घर जाकर उस व्यापारी ने भगवान बुद्ध की सीख को अपनाया और घर का वातावरण स्वतः बदल गया। अब सब अपने-अपने अहंकार को भूलकर एक-दूसरे के साथ प्रेम से रहने लगे। शीघ्र ही घर के दूषित वातावरण में नया उल्लास छा गया।

सीख : कभी भी अपने अहंकार के घमंड में दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करो, जो तुम्हें स्वयं के लिए पसंद न हो।

ईश्वर के दर्शन कैसे होंगे? [ Hindi Story ]

एक नदी के किनारे एक महात्मा रहते थे। उनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं का समाधान पाने आते थे। एक बार एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला- महाराज! मैं लंबे समय से ईश्वर की भक्ति कर रहा हूं, फिर भी मुझे ईश्वर के दर्शन नहीं होते। कृपया मुझे उनके दर्शन कराइए।




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महात्मा बोले- तुम्हें इस संसार में कौन सी चीजें सबसे अधिक प्रिय हैं?
व्यक्ति बोला- महाराज! मुझे इस संसार में सबसे अधिक प्रिय अपना परिवार है और उसके बाद धन-दौलत।


महात्मा ने पूछा- क्या इस समय भी तुम्हारे पास कोई प्रिय वस्तु है?
व्यक्ति बोला- मेरे पास एक सोने का सिक्का ही प्रिय वस्तु है।
महात्मा ने एक कागज पर कुछ लिखकर दिया और उससे पढ़ने को कहा। कागज देखकर व्यक्ति बोला- “महाराज! इस पर तो ईश्वर लिखा है।
महात्मा ने कहा- अब अपना सोने का सिक्का इस कागज के ऊपर लिखे ''ईश्वर'' शब्द पर रख दो।

व्यक्ति ने ऐसा ही किया। फिर महात्मा बोले- अब तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?”
वह बोला- इस समय तो मुझे इस कागज पर केवल सोने का सिक्का रखा दिखाई दे रहा है।

महात्मा ने कहा- ईश्वर का भी यही हाल है। वह हमारे अंदर ही है, लेकिन मोह-माया के कारण हम उसके दर्शन नहीं कर पाते। जब हम उसे देखने की कोशिश करते हैं तो मोह-माया आगे आ जाती है। धन-संपत्ति, घर-परिवार के सामने ईश्वर को देखने का समय ही नहीं होता। यदि समय होता भी है तो उस समय जब विपदा होती है। ऐसे में ईश्वर के दर्शन कैसे होंगे?

महात्मा की बातें सुनकर व्यक्ति समझ गया कि उसे मोह-माया से निकलना है।

Say goodbye without grief

Tung-men Wu did not grieve when his son died.

It is difficult not to grieve when somebody you loved so much has died. It is possible only if you have known something of the essential. It is possible only if you have tasted something of the deathless, if you have transcended the accidental. He did not grieve, he was not sad. He was not weeping or crying; he was not broken. He remained just the same as he was before.

The wife was disturbed. She said :

"No one in the world loved his son as much as you did, why do you not grieve now that he is dead?"

Ordinarily, this is our logic, that if you love a person too much you will grieve too much when he is gone. The logic is fallacious; the logic has a deep flaw in it. In fact, if you have loved a person really, when he is gone he is gone; you will not grieve much. If you have not loved the person deeply, then you will grieve very much.

Your father dies, or your mother dies. If you have loved him totally while he was alive, you will be able to say goodbye to him without any grief - because you loved him. That experience of love was total and fulfilling; nothing is left undone; nothing is hanging over your head. Whatsoever was possible has happened; now you can accept it. What more was possible? Even if he had been alive, what more would have been possible? The experience is complete.

Whenever an experience is complete, you are ready to say goodbye easily. But if you have not loved your father as you always wanted to, you have not been respectful towards him as you alwayswanted to, you will feel guilty. Now the father is gone; now there is no way to fulfil your desire - now there is no way to show your respect, your love. Now there is no way, you will feel yourself hanging in the middle, in limbo. You will not be at ease; you cannot say goodbye. You will cry and weep and you will be broken, and you will say that you are broken because your father is dead, but the real thing is something else.

Once an experience is complete, you can get out of it very easily - you can just slip out of it as the snake slips out of his old skin. If you love a woman and you have been constantly quarrelling with her, and it never became a deep satisfaction, and she dies...now she will haunt you, her ghost will haunt you for your whole life.

While you are loving a person, if you love him totally there is going to be no misery. Of course, one feels a little sad but it is not grief; one misses a little but one is capable of remaining centred, one is not distracted.

It is the unlived experiences that go on piling up and they become heavy burdens. The problem is that now there is no way. You cannot complete them because the person has disappeared. Whenever an experience is complete, it is a ripe fruit - it drops of its own accord. It leaves no scar behind, there is no wound.